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किन्हा वंश का इतिहास एवं विकास

गोकुलगढ़ का किला: इतिहास और विरासत

उपलब्ध पारिवारिक ऐतिहासिक विवरण के अनुसार, गोकुलगढ़ का किला क्षेत्र की प्राचीन ऐतिहासिक धरोहरों में से एक था। इस किले से जुड़ी कथाओं में वीरता, सुरक्षा व्यवस्था, स्थानीय शासकों और किन्हा परिवार के योगदान का उल्लेख मिलता है।

वीर हेमू और गोकुलगढ़ की गढ़ी

स्थानीय किंवदंती के अनुसार, रिवाड़ी नाम भगवान श्री कृष्ण के बड़े भाई बलराम जी की पुत्री रेवती के नाम से जुड़ा माना जाता है, हालांकि इस संबंध में निश्चित ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध नहीं बताए गए हैं।

मूल लेख में उल्लेख है कि सोलहवीं शताब्दी में इस क्षेत्र में डाकुओं का आतंक था। राव हरचन्द नामक वीर ने अपनी वीरता से क्षेत्र को सुरक्षित बनाया। उस समय रिवाड़ी मुस्लिम शासकों के अधीन था।

मूल विवरण के अनुसार, वर्ष 1516 में पूर्णदास नामक जाट व्यापारी अलवर जिले के मच्छेरी गांव से रिवाड़ी आकर बसे। वे शोरा और बारूद का संग्रह करके दिल्ली के शासक शेरशाह सूरी को भेजते थे। उनके पुत्र हेमू अपनी कार्यकुशलता के कारण सूरी की सेना में भर्ती हुए।

आगे चलकर हेमू ने विक्रमादित्य की उपाधि प्राप्त की। 7 अक्टूबर 1556 को पानीपत के द्वितीय युद्ध में अकबर की सेना से उनका संघर्ष हुआ और वे युद्ध में मारे गए। मूल लेख में उन्हें भारत का अंतिम हिंदू सम्राट कहा गया है।

इसी ऐतिहासिक विवरण में बताया गया है कि हेमू ने अपने शोरा-बारूद के कारोबार और सुरक्षा के उद्देश्य से गोकुलगढ़ के पूर्व में एक कच्ची गढ़ी बनवाई थी। इसकी रक्षा के लिए रोहड़ाई या किसी अन्य स्थान से दो-तीन किन्हा जाट परिवारों को लाकर बसाया गया था। ये परिवार गढ़ी की सुरक्षा और पहरेदारी का कार्य करते थे।

राव सरदार और गोकुलगढ़ का विकास

मूल लेख के अनुसार, कुछ समय बाद गढ़ी राव सरदारों के अधिकार में आ गई। राव रामसिंह जी की मृत्यु के बाद उनके पोते नन्दराम जी इस क्षेत्र के उत्तराधिकारी बने और उन्होंने 360 गांवों की जागीर संभाली।

इसके बाद राव गुजर मल जी यहां के सरदार बने। उन्होंने गुरावड़ा की छोटी गढ़ी को किले का रूप दिया और गोकुलगढ़ की भी मरम्मत करवाई। लेख में राव सरदारों के भरतपुर के शासक से अच्छे संबंध होने का उल्लेख मिलता है।

मूल विवरण के अनुसार, वर्ष 1770 में राव भवानी सिंह को उनके दीवान तुलसी राम ने जहर देकर मार डाला। इसके बाद मित्र सैन वजीर ने राज्य की जिम्मेदारी संभाली।

गोकुलगढ़ के किले में किन्हा परिवार की भूमिका

पारिवारिक परंपरा के अनुसार, किन्हा परिवार का एक युवक फतेह सिंह, जिन्हें फत्तु जाट के नाम से भी जाना जाता था, गोकुलगढ़ की कच्ची गढ़ी की रक्षा के लिए नियुक्त था। समय के साथ किन्हा परिवार के कई घर वहां बस गए और परिवार के युवा सदस्य किले की सेवा में लगे रहे।

मूल लेख में उल्लेख है कि किले के भीतर थोड़ी-थोड़ी दूरी पर मिट्टी के 52 मचान बने हुए थे। इनकी ऊंचाई लगभग 20 से 25 फुट बताई गई है। इन मचानों पर बैठकर पहरेदार रात के समय शत्रु की गतिविधियों पर निगरानी रखते थे। इस सुरक्षा व्यवस्था का नेतृत्व वीर फतेह सिंह जी करते थे।

जाटों वाली हवेली

किले के पास ही फतेह सिंह जी की कई मंजिला हवेली होने का उल्लेख मिलता है। मूल लेख के लेखक ने बताया है कि हवेली की दो मंजिलें खंडहर की अवस्था में मौजूद थीं और स्थानीय लोग इसे जाटों वाली हवेली के नाम से पुकारते थे।

किले के चारों ओर गहरी खाई होने का भी उल्लेख है। हवेली की दीवारें लगभग दो फुट चौड़ी बताई गई हैं। पुरानी छतें चूने और पत्थरों से बनी थीं और उनमें राजस्थानी शैली की लदाकार संरचना दिखाई देती थी। ऊपर जाने वाली सीढ़ियों की चौड़ाई लगभग पांच फुट बताई गई है।

हवेली में पहले कई बारादरियां थीं, लेकिन मूल विवरण के अनुसार केवल दो बारादरियां शेष बची थीं। किले के क्षेत्र में कुओं और एक कच्चे तालाब का भी उल्लेख मिलता है।

3 सितंबर 2014 का स्थल निरीक्षण

लेखक के अनुसार, 3 सितंबर 2014 को वे रोहड़ाई से श्री मंगलसिंह जी किन्हा, जो अध्यापक थे, तथा श्री रामेश्वर दयाल जी किन्हा की गाड़ी में चार-पांच व्यक्तियों के साथ गोकुलगढ़ गए थे। वहां उन्होंने वीर फतेह सिंह जी की हवेली और किले के अवशेष देखे।

लेखक ने उल्लेख किया कि उस समय स्थानीय स्तर पर कुछ लोग इस संरचना को मित्र सैन जी का महल भी बताते थे। मूल विवरण में इस संपत्ति के स्वामित्व और बाद के कब्जे को लेकर भी एक दावा किया गया है।

लेख के अनुसार, वर्ष 1962 में चकबंदी के समय किन्हा परिवार का कोई परिवार वहां शेष नहीं था। लेखक का दावा है कि इसके बाद श्री चुन्नी लाल जी बोहरा ने संपत्ति पर अपना स्वामित्व स्थापित कर लिया। संपत्ति के स्वामित्व से संबंधित इस कथन की पुष्टि राजस्व और भूमि अभिलेखों से की जानी चाहिए।

मित्र सैन के बाद का संघर्ष

मूल पारिवारिक विवरण में कहा गया है कि लगभग 1780 के आसपास मित्र सैन जी की मृत्यु के बाद गंगा बिशन नामक विरोधी व्यक्ति ने मराठों से मिलकर रिवाड़ी पर चढ़ाई करवाई। इसके परिणामस्वरूप गोकुलगढ़ का किला मराठों के अधिकार में चला गया।

इस संघर्ष में एक जोहड़ के पास लड़ाई होने का उल्लेख मिलता है। कथा के अनुसार, फतेह सिंह जी वीरता से लड़ते हुए घायल हो गए। उनके कुछ सैनिकों ने उन्हें बचाने का प्रयास किया और लिसाना गांव के पास ले गए, जहां उन्होंने प्राण त्याग दिए।

लेखक के अनुसार, लिसाना में उनकी समाधि के खंडहर देखे गए थे और उसका चित्र भी लिया गया था। इस लड़ाई के दौरान किन्हा परिवार के अनेक लोगों के मारे जाने और परिवार के उजड़ने की बात भी स्थानीय परंपरा में कही जाती है।

इस कथन के अनुसार, कुछ किन्हा परिवारों के स्त्री-पुरुष बचकर रोहड़ाई गांव पहुंचे। वहां उन्हें बसने के लिए स्थान मिला। बाद में उनके वंशज गोकुलिया पट्टी के नाम से पहचाने जाने लगे।

फतेह सिंह जी की मृत्यु से जुड़ी अलग-अलग मान्यताएं

मूल लेख में लेखक ने स्वीकार किया है कि प्राचीन वीर फतेह सिंह जी की मृत्यु की निश्चित तारीख और लिखित प्रमाण उन्हें प्राप्त नहीं हुए थे। उपलब्ध विवरण मुख्य रूप से बुजुर्गों से सुनी गई बातों पर आधारित है।

कुछ बुजुर्गों के अनुसार, वर्ष 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान अंग्रेजी सेना के रिवाड़ी पर आक्रमण के समय फतेह सिंह जी गोकुलगढ़ के किले की रक्षा करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए थे। अन्य कथनों में उनकी मृत्यु मराठों के साथ हुए संघर्ष से संबंधित बताई गई है।

लेखक ने यह भी उल्लेख किया है कि कुछ बुजुर्गों के अनुसार लिसाना में किन्हा परिवार की रिश्तेदारी थी और फतेह सिंह जी की छतरी बनवाने में स्थानीय परिवारों का योगदान रहा था। यह छतरी मुख्य सड़क के किनारे मंदिर के प्रांगण में स्थित बताई गई है।

किले और हवेली के वर्तमान अवशेष

मूल लेख के अनुसार, गोकुलगढ़ का किला कभी काफी बड़ा था। लेख लिखे जाने के समय इसके दो मचान शेष बताए गए थे। किले के क्षेत्र में कई कुएं और एक कच्चा तालाब भी मौजूद थे।

समय के साथ किले और हवेली के क्षेत्र में अनधिकृत निर्माण होने का उल्लेख मिलता है। पुरानी हवेली का केवल कुछ हिस्सा बचा था। मित्र सैन जी के महल से संबंधित बताई जाने वाली संरचनाओं को तोड़कर वहां मकान बनाए जाने तथा कुछ भाग में पाठशाला स्थापित होने का विवरण भी मूल लेख में दिया गया है।

ऐतिहासिक अभिलेखों की खोज की अपील

लेखक ने रोहड़ाई के किन्हा परिवार से अपील की है कि वे फतेह सिंह जी के जीवन से संबंधित पुराने उर्दू अभिलेखों की तहसील और जिला रेवाड़ी के रिकॉर्ड में खोज करें।

इन अभिलेखों की सहायता से प्राचीन फतेह सिंह जी की पहचान, उनकी सैन्य भूमिका, मृत्यु की तारीख, किले का इतिहास और किन्हा परिवार की बसावट के बारे में अधिक विश्वसनीय जानकारी प्राप्त की जा सकती है।

ऐतिहासिक टिप्पणी

यह विवरण उपलब्ध पारिवारिक इतिहास, स्थानीय परंपराओं, बुजुर्गों के कथनों और लेखक के स्थल निरीक्षण पर आधारित है। प्राचीन योद्धा फतेह सिंह जी और स्वतंत्रता सेनानी फतेह सिंह जी किन्हा को अलग-अलग व्यक्तियों के रूप में दर्ज किया जाना चाहिए, जब तक उनके एक ही व्यक्ति होने का विश्वसनीय प्रमाण न मिल जाए।

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